बांध पर उगाये जाने वाले फल सीताफल को प्रसिद्धि दिलाने का काम बार्शी तालुका के गोरमाले के किसान नवनाथ मल्हारी कसपटे ने किया है| यह कोई साधारण सफलता की कहानी नहीं है| इसके पीछे है 'सीताफल किंग' नवनाथ का अध्ययन, मेहनत और दृढ़ संकल्प! उनके कारण न केवल गोरमाले या बार्शी तालुका बल्कि सोलापुर ज़िले का भी नाम सात समुन्दर पार पहुंच गया है| क्योंकि उनके द्वारा विकसित सीताफल की 'एनएमके १ गोल्डन' किस्म दुबई, मस्कट समेत यूरोप पहुंच चुकी है| 'एनएमके' यानी नवनाथ मल्हारी कसपटे| और इस किस्म के फल करीब-करीब सुनहरे रंग के होते हैं इसलिए 'गोल्डन’!
हालांकि 'एनएमके १ गोल्डन' का कारोबार आज करोड़ों रुपये का है, लेकिन नवनाथ का यह सफर आसान नहीं था| ११वीं पास करने के बाद नवनाथ कसपटे डॉक्टर बनना चाहते थे| लेकिन घर की आर्थिक हालत खराब थी| उनके भाई ने उन्हें पढ़ाई और नौकरी करने के बजाय कृषि पर ही ध्यान देने की सलाह दी और नवनाथ ने अपने खेत में काम करना शुरू कर दिया| जैसे-जैसे उन्हें अपने खेतों के लिए अधिक से अधिक पानी मिलने लगा, उन्होंने बेर, अंगूर आदि की खेती शुरू कर दी| यहां तक कि वे अंगूर के सर्वोच्च निर्यातक होने का सम्मान पाने में भी सफल रहे| लेकिन सीताफल से उनका विशेष लगाव था| उन्होंने तटबंध बनाने की बजाय खेत की ज़मीन पर सीताफल के पौधे लगाकर उत्पादन शुरू किया| १९९० के आसपास, उन्होंने अपना सीताफल बाग सिर्फ दस हज़ार में एक को दे दिया| चूँकि उन्होंने कुछ माल बरकरार रखा था, वे खुद वाशी बाज़ार गए और तब उन्हें पता चला कि सीताफल अच्छी कीमत कमा सकता है| इस समय उन्होंने मार्केटिंग के बारे में और समझने की कोशिश की और उन्होंने महसूस किया कि अंगूर की तुलना में सीताफल ज़्यादा फायदेमंद है| इसके बाद, नवनाथ ने धीरे-धीरे सभी अंगूर की बेलों को निकाल दिया और सिर्फ सीताफल की वरायटी लगाने लगे|
यहां से उनकी समृद्धि का दौर शुरू हुआ| वे कहते हैं, “सीताफल ने मुझे कभी घाटे में नहीं डाला| अधिकतम २,५०० मिलीमीटर और न्यूनतम ४०० से ५०० मिलीमीटर बारिश में भी खिलने वाला सीताफल मेरे अध्ययन का विषय बना| २००१ में मैंने देखा कि 'क्रॉस पोलिनेशन' के कारण एक नई नस्ल विकसित हो रही थी| फिर मैंने ११ साल तक इसका गहन अध्ययन किया और सुनहरे रंग के सीताफल की एक नई किस्म खोजी, जिसका वज़न करीब डेढ़ से दो किलो था| उसके सभी परीक्षणों के बाद मैंने उसका नया स्ट्रेन विकसित किया| मैंने इसे २०११ में निकाला था| मैंने इसे न सिर्फ अपने खेत में लगाया, बल्कि नर्सरी में दूसरे किसानों को भी बेचना शुरू किया| आज हज़ारों किसान 'एनएमके १ गोल्डन' स्ट्रेन की खेती कर लाखों रुपए सालाना कमा रहे हैं| मैं वास्तव में इससे संतुष्ट और खुश हूं|”
गोरमाला के मधुबन फार्म और नर्सरी में न केवल सोलापुर ज़िले से बल्कि महाराष्ट्र के सभी ज़िलों सहित कर्नाटक-तेलंगाना से भी किसान नई किस्म को देखने आने लगे| प्रतिदिन कम से कम सौ से डेढ़ सौ किसान आते थे| उनको जानकारी देने व अन्य कामों के लिए दस लोगों का स्टाफ नियुक्त किया गया है| इन पर्यटक किसान यात्राओं से गोरमाला क्षेत्र के होटल, लॉज और अन्य व्यवसायियों को भी लाभ हो रहा है और उनकी भी आय बढ़ रही है| इस नर्सरी से किसानों ने विश्वास के साथ 'एनएमके १ गोल्डन' सीताफल के पौधे लेना शुरू किया और लाखों की कमाई करने लगे| नवनाथ कसपटे कहते हैं, “प्रति एकड़ पचास हज़ार तक आय देने वाली तूर और मूंग के लिए किसान अपना सब कुछ दे देते हैं| लेकिन चार से पांच लाख आय देने वाले सीताफल को तटबांध पर उगाते हैं| पौधरोपण के ढाई साल के भीतर पैसा देने वाले सीताफल के बाग ५० साल तक चलते हैं| अगर ठीक से देखभाल की जाए तो ये उससे भी ज़्यादा समय तक चलते हैं| यदि छंटाई की उचित तकनीकों का उपयोग किया जाए तो उत्पादन नियमित हो सकता है| मेरी ४० एकड़ से मुझे सालाना २.५ करोड़ रुपये की आय होती है| खास बात यह है कि जनवरी से जून तक छह महीनों के दौरान इस बगीचे को पानी देने की ज़रूरत नहीं होती है|”
विनाशकारी माने जाने वाले सीताफल से २.५ करोड़ की आमदनी होना निश्चित रूप से एक उपलब्धि है| उन्हें 'एनएमके १ गोल्डन' का पेटेंट मिल जाने के कारण पौध की बिक्री से प्रति माह औसतन दस लाख की आमदनी होती है|
नवनाथ कसपटे को अब 'सीताफल किंग' के नाम से जाना जाता है| आम, अंगूर, अनार और चीकू पहले से ही केंद्र सरकार की पेटेंट की सूची में थे| लेकिन सीताफल नहीं था| उन्होंने सीताफल को पेटेंट सूची में शामिल करने के लिए दिल्ली में प्रयास किये| दो साल की कड़ी मेहनत के बाद उन्हें सफलता मिली| २००३ में, उन्होंने महाराष्ट्र सीताफल उत्पादक संघ की स्थापना की और इसके संस्थापक अध्यक्ष बने|
११वीं पास करने के बाद डॉक्टर बनने की इच्छा रखने वाले नवनाथ ने 'एनएमके १ गोल्डन' पर अपने शोध के लिए बेंगलुरु की नेशनल वर्चुअल यूनिवर्सिटी फॉर एग्रो एजुकेशन से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की है| अब वे डॉ. नवनाथ मल्हारी कसपटे हो गए हैं| उनकी सीताफल की इस किस्म को विश्व स्तर पर मान्यता दी गई है| इसका अध्ययन कृषि महाविद्यालय स्तर पर किया जा रहा है| डॉ. कसपटे को पिछले कुछ वर्षों में ६७ से अधिक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है| २०१५ में उन्हें फसल किस्म संरक्षण के लिए केंद्र सरकार का 'प्लांट जीनोम सेवियर फार्मर' पुरस्कार मिला|
उनकी इस किस्म की ख़ासियत यह है कि यह अच्छी जल निकासी वाली किसी भी हल्की या भारी मिट्टी में उग जाती है| यह ५० साल तक चलती है| उनके खेत में एक फल का वज़न एक से डेढ़ किलो है| इसकी कटाई करते समय, इसे सावधानी से तने से तोड़ना पड़ता है| अन्य स्थानों पर, मिट्टी के आधार पर इसकी ग्रेडिंग २५० ग्राम से ८०० ग्राम के बीच होती है| श्री. कसपटे ने अपनी पचास एकड़ में से ढाई एकड़ ज़मीन पर सीताफल की ४२ किस्में लगाई हैं| उनके अपने परागण से ३००० से अधिक पौधे पैदा होते हैं| उन्हें फिर चयन पद्धति के अनुसार चुना जाता है| विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ उन्हें नोट करने का कार्य करते हैं| मधुबन फार्म अब एक कृषि पर्यटन केंद्र और पौध बिक्री केंद्र बन गया है| देश में सीताफल के ८०% बागान अब 'एनएमके १ गोल्डन' किस्म के हैं| चूंकि उनके पास स्वामित्व अधिकार हैं, इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि देश भर के सभी पौध बिक्री केंद्रों को श्री. कसपटे की किस्म ही बेचनी होगी| जो लोग कहते हैं कि कृषि घाटे में जा रही है, उनके लिए 'एनएमके' एक अनुकरणीय उदाहरण होना चाहिए|
नवनाथ कसपटे – मोबाइल नंबर - 7350500000
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