ऐसे कई लोग हैं जो गाय वंश में सुधार और इस उद्देश्य के लिए गायों को पालने का शौक रखते हैं| देश भर के हज़ार से ज़्यादा सेवा संस्थाओं के पांच हज़ार प्रतिनिधियों के महासेवा संगम जयपुर से लौटे कार्यकर्ताओं से हमें ऐसे ही एक दीवाने आदमी के बारे में जानकारी मिली और हम हैरान रह गये| इस गाय-प्रेमी का नाम भीमराज शर्मा है| जयपुर रेलवे स्टेशन से चार किलोमीटर दूर सुदर्शनपुरा इंडस्ट्रियल एरिया है, जहां अधिकांश प्रिंटिंग प्रेस स्थित हैं| इनमें से एक प्रेस भीमराज शर्मा का है| भीमराज ने विजुअल आर्ट में डिप्लोमा किया है| वे पिछले बीस से ज़्यादा वर्षों से प्रिंटिंग व्यवसाय में हैं| यह २०१४-१५ के बीच की बात होगी| वे आयुर्वेद और गायों के प्रति जागरुकता फैलाने का काम करने वाले राजीव दीक्षित का एक वीडियो क्लिप देख रहे थे| उस क्लिप में सड़कों पर घूमने वाली गायों, वाहन दुर्घटना में उनकी मृत्यु या उनकी तस्करी कर अवैध वध के बारे में चिंता जताई गयी थी|
गाय के गोबर से अगरबत्ती, राखी, पेंसिल जैसी ७० ईको-फ्रेंडली वस्तुएं बनाईं
भीमराज ने और अध्ययन करना शुरू किया और महसूस किया कि एक गाय औसतन १५ साल तक जीवित रहती है, जिसमें से १० साल वह दूध देती ही नहीं है| लेकिन इन सभी १५ वर्षों में वह कीमती गोबर देती है| भीमराज ने इस गोबर से क्या बनाया जा सकता है, इस पर बहुत शोध किया और इससे लक्ष्मी और गणपति की मूर्तियाँ और सजावटी दिये बनाए| भीमराज ने अपने उद्योग का नाम गौकृति रखा| उन्होंने छोटे हवन कुंड, अगरबत्ती, राखी, पेंसिल जैसी वस्तुएं बनाईं| इंसान के जन्म से लेकर मृत्यु तक उपयोग में आने वाली ये सभी ७० प्रकार की वस्तुएं इको-फ्रेंडली श्रेणी में आती हैं| उनका दावा है कि यदि इनमें से किसी भी वस्तु को बिना इस्तेमाल या आंशिक रूप से इस्तेमाल करके फेंक दिया जाये तो ज़मीन का पानी मिलते ही उससे एक नया पौधा पनपने लगता है|
यह जानने के बाद कि अफ्रीका में हाथी के गोबर से कागज़ बनाया जाता है, उन्होंने गाय के गोबर से कागज़ बनाने का फैसला किया गौकृति के उत्पाद ग्राहकों को पसंद आने लगे और उन्होंने महसूस किया कि दिन में २४ घंटे उत्पादों के निर्माण के बावजूद ग्राहकों की मांगों को पूरा करना मुश्किल था| जब उनकी बेटी किसी काम से दक्षिण अफ्रीका गई तो उसने वहां हाथी के गोबर से कागज़ बनते देखा| अगर हाथी के गोबर का उपयोग किया जा सकता है, तो गाय के गोबर से कागज़ क्यों नहीं बनाया जा सकता, ऐसा सवाल उसने पूछा, और भीमराज के दिमाग में शोध का कीड़ा मंडराने लगा|
गोबर से बने कागज़ को देखकर कई लोगों ने उपहास किया; लेकिन भीमराज ने अपनी ज़िद्द नहीं छोड़ी
गोबर से कागज़ बनाने के लिए मशीनरी की ज़रूरत होगी| अभी तक किसी ने भी यह उत्पाद नहीं बनाया था, तो इसके लिए तैयार उपकरण मिलेगा कहां से? फिर भीमराज ने खुद ही मशीनरी डिज़ाइन की और उसी के अनुसार वह बनवाई| मशीन बन तो गयी, लेकिन उसे चलाना कहां आता था? इसलिए कागज़ के नाम पर जो भी बना वह हाथ में पकड़ने लायक भी नहीं था| जिन-जिन लोगों ने यह प्रयोग देखा था, जिन्होंने इसके बारे में सुना था, उन्होंने उपहास किया| लेकिन भीमराज ने अपनी ज़िद्द नहीं छोड़ी| उन्होंने इंटरनेट पर ढूंढ़ना शुरू किया और उन्हें कई वीडियो देखने को मिले|
गोबर से कागज़ बनाने के व्यवसाय के लिए पैसे मांगने पर लोगों ने उनका उपहास किया
जयपुर शहर में ऐसी कई गोशालाएं हैं जहां गोबर को सिर्फ खाद बनाने के लिए ही खरीदा जाता है| भीमराज ताज़ा गोबर खरीदते थे क्योंकि उन्होंने कहीं पढ़ा था कि सड़ने के बाद उसमें कीड़े पड़ जाते हैं और वह बेकार हो जाता है| उन्होंने इस गोबर में कपड़े के महीन टुकड़े पीसना शुरू किया| उन्होंने उस कपड़े के पाउडर में ५०% गोबर मिलाकर उसे ढाई से तीन घंटे तक प्रोसेस करके उसका पल्प बनाया| फिर इस पल्प को एक जालीदार फ्रेम पर फैलाकर उस पर पर्याप्त दबाव डालकर उसमें से पानी निकाला जाता है| करीब २४ घंटे तक इसे ऐसे ही सुखाया जाता है| फिर इससे कागज़ बनाया गया, और इसे सख्त बनाने और इसे टूटने या फटने से बचाने के लिए इसमें एक विशेष प्रकार का तरल गोंद मिलाया गया था| कागज़ को रंगने के लिए उस पर हल्दी और जैविक पदार्थ का प्रयोग किया गया| इस कागज़ के उत्पादन के लिए धन की आवश्यकता थी| भीमराज ने जब लोगों के पास जाकर पैसे मांगे तो लोगों ने उनका उपहास किया|
दुकानदार गोबर से बना कागज़ रखने को तैयार नहीं थे, इसलिए फ्री सैंपल्स भेजे और दुविधा दूर की
भीमराज ने तब एक जुआ खेलने का फैसला किया| उन्होंने अपनी बेटी की शादी के लिए अलग रखे तीन लाख रुपये को इस काम में लगाने का फैसला किया| दो साल की कोशिशों के बाद २०१६-१७ में जब कागज़ का उत्पादन शुरू हुआ तो शुरुआत में लोगों ने इसे अपने हाथ में भी नहीं लिया| फिर उन्होंने ऊपर बताए अनुसार उपहार बनाना शुरू किया| आज वे ७० प्रकार के उपहार बनाकर बेचते हैं| वे प्रतिदिन कागज़ की तीन हज़ार शीट्स बनाते हैं| शुरुआत में दुकानदार उस कागज़ को रखने को तैयार नहीं थे, लेकिन फिर उन्होंने शहरों में लगने वाली प्रदर्शनियों में उसे रखना शुरू किया| वे उस कागज़ के सैंपल्स को कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, कॉनफेरेन्स और सेमिनार्स में भेजने लगे और दुविधा की स्थिति हल हो गयी| लाल बहादुर शास्त्री नैशनल एकडेमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन जैसी बड़ी-बड़ी संस्थाएं उस कागज़ का प्रयोग करने लगीं| उस कागज़ से बनी डायरी, किताबें, कैलेंडर, ग्रीटिंग कार्ड्स, फाइलें, फोल्डर्स लोगों को पसंद आने लगे|
भारत समेत अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों में यह कागज़ बेचा जाता है
उपरोक्त वस्तुओं को बनाने के लिए उन्हें प्रतिदिन तीन क्विंटल गोबर की आवश्यकता होती है| वे कोलकाता के एक होज़िएरी हाउस से थोक के भाव में चिथड़े मंगवाते हैं और उत्पाद बनाते हैं| भीमराज ने अपने उत्पाद का पेटेंट कराया है| कोरोना के बाद भीमराज ने ऐमज़ॉन, फ्लिपकार्ट पर भी ऑनलाइन बिक्री शुरू की है| भारत में मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई में उनका कागज़ उपलब्ध है ही, लेकिन भारत के बाहर अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया समेत कई अन्य देशों में इसकी बिक्री होती है| महज़ २१ कर्मचारियों से चलने वाला यह उद्योग एक करोड़ का कारोबार पूरा कर अब एक और छलांग लगाने की तैयारी कर रहा है| गाय का गोबर और चिथड़े महाराष्ट्र में भी उपलब्ध हैं| हालांकि, मराठी बच्चों में भीमराज से प्रेरणा लेकर ऊंची उड़ान भरने का साहस और ज़िद्द पैदा करने की ज़रूरत है|
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