"कोरोना अभिशाप नहीं, वरदान है" यदि यह विषय उठाना पड़े, तो कोरोना द्वारा दी गयीं असंख्य सकारात्मक चीज़ों के बारे में लिखना पड़ेगा| उनमें से एक तथ्य यह है कि भारत आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है| भारत की यह आत्मनिर्भरता कई क्षेत्रों में देखने को मिली - कोरोना काल में पीपीई किट के उत्पादन में, कोरोना रोधक आयुर्वेदिक दवाओं के शोध में, अपनी ज़रूरत को पूरा करने के बाद दुनिया को प्रदान की गयी वैक्सीन के उत्पादन में, घर से बाहर निकलने में असमर्थ भारतीयों के तेज़ी से डिजिटल माध्यम को और ऑनलाइन या वर्क फ्रॉम होम की पद्धति को अपनाने में, जब दुनिया में मृतकों की संख्या बढ़ रही थी तो इस संख्या को नियंत्रण में रखने में|
कोरोना के आने के बाद सिनेमाघर, होटल और सार्वजनिक वाहन बंद हो गए| स्वाभाविक रूप से, लोगों के मनोरंजन के साधन सीमित हो गए, खाद्य पदार्थ की उपलब्धि के रास्ते बंद हो गए, और नौकरी पर जाने के लिए परिवहन मार्ग बंद हो गए|
फिर 'ओटीटी', 'स्विगी', 'ज़ोमैटो' और 'वर्क फ्रॉम होम' जैसे नए विकल्प आये| जब हमें इस स्थिति की आदत पड़ने लगी तब अंतर्राष्ट्रीय यात्रा पर भी प्रतिबन्ध लग गया, और फिर उपभोग्य सामग्रियों के आयात के विकल्प ढूंढ़ने की सख्त ज़रूरत थी| कोरोना चीन से आया था, इसलिए भारत सरकार ने चीनी उत्पादों के आयात पर रोक लगा दी थी| "मेड इन इंडिया" उत्पादों की शुरुआत ऐसे ही हुई थी|
कोरोना के आने से 'स्टार्ट-अप्स' का जाल और घना होने लगा था| समय किसी के लिए नहीं रुकता| जिस तरह उस अजेय समय की गति और दिशा को पहचानने वाले जीवन में सफल होते हैं, उसी तरह यह भी उतना ही सच है कि सफलता उन्हें भी मिलती है जो भविष्य के बारे में भविष्यवाणी करके बदलते समय के अनुसार व्यवसायिक निर्णय लेते हैं| केवल वही व्यवसाय जीवित रहते हैं जो इस ज़रूरत को पहचानकर तदनुसार आवश्यक कौशल प्राप्त करते हैं, और ऐसे उद्योग ढूंढने वाले व्यक्ति ही नव-उद्यमी बनते हैं|
ऐसी ही एक नव-उद्यमी हैं दर्शिता छेडा| दर्शिता ने कमर्शियल आर्ट्स की शिक्षा प्राप्त की और लगभग दस वर्षों तक प्रिंट मीडिया में काम भी किया| परन्तु डिज़ाइनर का खून उनकी रगों में दौड़ रहा था| घर के ही एक कार्यक्रम में जाने के लिए दर्शिता ने अपनी ड्रेस से मैचिंग एक पर्स बनाया जो सबको पसंद आया| दोस्तों और रिश्तेदारों ने उनसे ऐसे ही पर्स उनके लिए भी बनाने का अनुरोध किया और इसी से ' बी यू लाईफ स्टाईल' नाम के पर्स ब्रैंड का जन्म हुआ|
दर्शिता के पिता वस्त्र उद्योग में थे| उनके कारखाने से निकलने वाले बेकार कपड़े को इकठ्ठा करके दर्शिता ने नए-नए डिज़ाइन के बैग बनाना शुरू किया| दर्शिता के डिज़ाइन्स अच्छे थे, सौभाग्य से उन्हें अच्छे कारीगर मिले| पर्स में लगने वाले हैंडल्स, रिंग्स, मैग्नेट्स चीनी मार्केट से आते थे| इस सब के चलते मांग बढ़ती जा रही थी|
कारीगर कहने लगे, “मैडम, एक-दो ऑर्डर पर काम करने में मजा नहीं आता| बड़ी कंपनियों में प्रयत्न कीजिये, पांच सो - हज़ार का आर्डर मिला तो हमें भी काम करने में मज़ा आएगा|” कारीगर इस व्यवसाय की रीढ़ हैं| दर्शिता ने नयी तकनीकों को अपनाने की कोशिश की, कारीगरों ने उन्हें स्वीकार किया, उनमें आत्मविश्वास आ गया, और कारीगरों ने उनका समर्थन किया क्योंकि मुसीबत के समय दर्शिता उनके साथ खड़ी रहीं|
दर्शिता जानती थी कि कारीगरों का अस्तित्व निर्वाह मात्र है| उन्हें काम मिलने पर ही दो वक्त का खाना मिलेगा| जो लोग अपने गाँव नहीं लौटे बल्कि मुंबई में ही रहे, उनके खाते में दर्शिता वेतन राशि जमा करती रहीं चाहे उनके पास काम हो या न हो, और उन्हें दवाएं उपलब्ध कराईं|
जिन कर्मचारियों को इस मदद का एहसास था, वे मैडम को आश्वासन देते थे, "मैडम टेंशन मत लीजिये| आपका काम हो जाएगा|" और ऐसा ही हुआ| दर्शिता ने उन पर भरोसा किया और... उन्हें पहला बड़ा आर्डर रीगल शूज़ ब्रैंड से मिला| हालांकि नाम में शूज़ है फिर भी उनका पर्स का काउंटर है| दर्शिता के बैग वहाँ रखे जाने लगे और 'खुल जा सिम सिम' जैसा जादू हो गया| २०१२ में व्यवसाय शुरू हुआ था| सात आठ साल बढ़िया चला परन्तु कोरोना के आने पर सब कुछ ठप हो गया| कोरोना ने सीख दी कि कम खर्चे में जीवन कैसे जीएं, और लक्ज़री सामान की खरीदी बंद हो गयी|
चीन से माल खरीदने वाले बैग और पर्स के थोक विक्रेता असमंजस में थे| चीन से माल आना बंद हो गया| दर्शिता को इसमें एक अवसर दिखा और उन्होंने भारतीय बाज़ार में उपलब्ध भारतीय कच्चे माल और एक्सेसरीज़ का उपयोग करके ऐसे बैग बनाने शुरू किये जो चीनी उत्पादों को टक्कर दें| इससे पहले बैग के लिए ज़रूरी ७० प्रतिशत कच्चा माल चीन से आता था और ३० प्रतिशत कच्चा माल भारतीय बाज़ार से चुन चुनकर जमा करना पड़ता था| आज स्थिति उल्टी है, अब सत्तर प्रतिशत कच्चे माल का निर्माण भारत में ही होता है और कुछ माल के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता है|
भायखला में बहुत छोटी सी जगह में शुरुआत हुई थी, कोरोना ने हाथ बढ़ाया और अब भायखला में बड़ी जगह में कारखाना शुरू है, दादर में खुद का ऑफिस है, दो - तीन यूनिट्स में काम शुरू रहता है और १५ - २० कारीगरों के कार्यबल के साथ दर्शिता के कारखाने में आज कई हज़ार बैग बनते हैं|
जब कि ये बैग्स मध्यम वर्ग के लिए किफ़ायती हैं, परन्तु उनके पास उच्च वर्ग के ग्राहक भी हैं| कई प्रतिष्ठित ब्रैंड्स उनके बैग खरीदते हैं| लेकिन चूँकि उन पर नाम उनके ब्रैंड का है तो दर्शिता और उनके कारीगर छाती ठोककर कह सकते हैं कि विश्वास के साथ उन बैग्स को लें, उनकी गारंटी हम देते हैं|
दर्शिता नई पीढ़ी की उद्यमी हैं, स्वाभाविक रूप से, वे अपने व्यवसाय को हार्डवर्किंग के बजाय स्मार्ट वर्किंग की दिशा में ले जाने का प्रयत्न कर रही हैं| उनके भविष्य के प्रयासों के लिए शुभकामनाएं|
व्यवसाय की योजना बनाते समय, यह जांचना महत्वपूर्ण है कि आपका बिज़नेस आईडिया वास्तव में व्यवहार्य है या नहीं| इसके लिए deAsra फाउंडेशन की IDEA VALIDATION सर्विस आपके लिए फायदेमंद हो सकती है|
अधिक जानकारी के लिए आप deAsra से इस व्हाट्सएप्प नंबर 93730 35540 पर संपर्क कर सकते हैं|
Notice: This site uses cookies to provide necessary website functionality, improve your experience and analyze our traffic. By using our website, you agree to our legal policies.