इस सुपरफूड की सिफारिश अंतरिक्ष यात्रियों के लिए अंतरिक्ष में उपभोग के लिए उपयुक्त खाद्य पदार्थ के रूप में की गई है| रामदाना एक बहुमुखी और पौष्टिक अनाज है जिसका उपयोग प्राचीन काल से भारत में उपवास के लिए पूरी, भाकरी, थालीपीठ, हलवा, खीर, वड़ी, लड्डू जैसे कई प्रकार के नमकीन और मीठे व्यंजन बनाने में किया जाता रहा है| बार्शी के सालुंखे परिवार ने रामदाना लड्डू और विभिन्न प्रकार की चिक्की बनाकर 'सुप्रस' नाम से अपना खुद का ब्रैंड बनाया है| सोलापुर, लातूर, धाराशिव में उनके उत्पादों की अच्छी मांग है|
बड़ी पूंजी, तकनीकी ज्ञान, बाज़ार में प्रतिष्ठा, जोखिम वाले निर्णय, लाभ, हानि… इन शब्दों को सुनकर ही आम आदमी दबाव महसूस करने लगता है और वह व्यवसाय करने के बारे में सोचता भी नहीं है| लेकिन बार्शी जैसे छोटे से गांव के एक युवा धीरज सालुंखे ने बहुत ही सहजता से २००५ में रामदाने के लड्डू बनाने का व्यवसाय शुरू किया और पिछले १७-१८ वर्षों में छोटे-छोटे कदम उठाकर इसका विस्तार किया| उनकी सफलता की कहानी से कई उद्यमी प्रेरणा ले सकते हैं|
यह महसूस करते हुए कि रिटेल बिक्री में रामदाने के लड्डुओं की भारी मांग है, इस व्यवसाय में प्रवेश करने का फैसला किया
धीरज शुरुआत में दूसरों के पापड़ और अचार बेचने का काम करते थे| वे शहर के थोक विक्रेताओं से रामदाने के लड्डू और चिक्की खरीदकर घर-घर जाकर उन्हें बेचते थे| तब उन्हें एहसास हुआ कि रामदाने के लड्डू की लगातार भारी मांग है| फिर उन्होंने सोचा कि क्यों न हम ही इस व्यवसाय में उतरें| तब उनकी मां सुभद्रा ने रामदाना कैसे लाया जाए और कैसे तोड़ा जाए, इस पर कई प्रयोग किए| उन्होंने लड्डू और चिक्की बनाना सीखा| धीरज शुरुआत में एक थैले में लड्डू और चिक्की लेकर जाते थे| वे लोगों को सैंपल देकर चखकर देखने के लिए कहते थे| वे लोगों को समझाते थे कि यह बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन के रूप में किता उपयुक्त है| इससे उनके माल की मांग पैदा होने लगी| उनकी शादी के बाद उनकी पत्नी दीपाली भी इस काम में अपना योगदान देने लगीं| उन्होंने भी सब कुछ सीख लिया| शुरुआत में रामदाने को गर्म कढ़ाई में भून-भूनकर इसे कपड़े की सहायता से मोड़कर इसकी लैया बनाई जाती थी|
लड्डू के साथ-साथ वे पांच तरह की चिक्की भी बनाते हैं
फिर २०१२ में, उन्होंने बैंक से तीन लाख रुपये का ऋण लेकर इंडस्ट्रियल एस्टेट में एक जगह किराए पर ली| उन्होंने रामदाना भूनने के लिए स्वचालित मशीन खरीदी जिसमें रामदाना डालने पर लैया बनती है| रामदाने के लड्डू बनाने के लिए लैया में नरम, तरल गुड़ मिलाया जाता है| इन दोनों को अच्छी तरह मिलाने के बाद गर्म रहते हुए ही इसके निश्चित आकार के लड्डू बनाये जाते हैं| लड्डू के साथ-साथ वे पांच तरह की चिक्की भी बनाते हैं - रामदाना मूंगफली, गुड़दाणी, नारियल, तिल और पीनट बटर| मांग के अनुसार काजू और बादाम की चिक्की बनाई जाती है| सामान्यतः ग्राहकों की मांग के अनुसार २०० से ५०० किलोग्राम चिक्की का उत्पादन किया जाता है| चिक्की के लिए अच्छी तरह भुनी और छिली हुई मूंगफली ली जाती है| मूंगफली के साथ नरम, तरल गुड़ मिलाया जाता है| मिश्रण के गर्म रहते हुए ही इसे एक सपाट सतह पर बेल दिया जाता है| इसके बाद चिक्की को कटर की सहायता से मनचाहे आकार में काट लिया जाता है| पहले वे पैकिंग भी हाथ से करते थे, अब वे स्वचालित मशीन पर मनचाहे आकार में पैकिंग और लेबलिंग करते हैं| फिलहाल उनके पास पांच महिला और दो पुरुष कर्मचारी कार्यरत हैं|
प्रतिमाह दो से ढाई लाख तक का टर्नओवर, भविष्य में नमकीन भेल बनाने का इरादा
हाल के कुछ वर्षों में रामदाने के लड्डू और चिक्की की मांग पूरे राज्य में बढ़ी है| ग्राहकों की मांग का अध्ययन करने के बाद, वे आमतौर पर २० ग्राम, ५० ग्राम, १०० ग्राम, २०० ग्राम, ५०० ग्राम वज़न के चिक्की के पैकेट बनाते हैं| मात्रा के आधार पर चिक्की की कीमत पांच रुपये से लेकर डेढ़ सौ रुपये तक है| मिक्स चिक्की के आधा किलो के पैकेट की कीमत २५० रुपये तक है| रामदाने के लड्डू की कीमत पैकिंग के आधार पर १० रुपये से ५० रुपये के बीच है| इसके साथ ही ग्राहकों की मांग के अनुसार आधा से एक किलो तक की मात्रा में उत्पाद बेचा जाता है| उपवास के दिनों में उनके सभी उत्पादों की मांग बड़े पैमाने पर बढ़ जाती है| सेल्समैन के माध्यम से रिटेल और थोक विक्रेताओं को उत्पाद भेजे जाते हैं| इससे प्रति माह दो से ढाई लाख तक का टर्नओवर होता है| सालुंखे परिवार का इरादा भविष्य में नमकीन भेल का उत्पादन करने का है और हमें विश्वास है कि वे अपने इरादों को साकार करेंगे|
दीपाली सालुंखे :- 9284757514
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