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‘एसटीडी' बाबा से 'कृषिकेंद्र' चालक

बार्शी तालुका के पांगरी जैसे छोटे से गांव में मात्र पांच हज़ार रुपए से शुरू किए गए 'एसटीडी' बूथ के कारण बाबासाहेब चंद्रभान शिंदे पंचक्रोशी में 'एसटीडी' बाबा के नाम से मशहूर हो गए| यह घटना १९९९ से २००० के बीच की है| उस समय गांव में पहले से ही एक 'एसटीडी बूथ' मौजूद था| फिर भी उन्होंने पांगरी क्षेत्र में अंगूर के बागानों के कारण रिकॉर्ड कारोबार किया! उनका फायदा कैसे हुआ यह हम अगले भाग में पढ़ेंगे, लेकिन फोन क्रांति के बाद जब एसटीडी बूथ की ज़रूरत नहीं रही तो उन्होंने कुछ समय के लिए सीमेंट बिक्री का व्यवसाय शुरू किया| लेकिन यह ज़्यादा समय तक नहीं चल सका| फिर उन्होंने कृषि फसलों के लिए औषधियां बेचना शुरू किया और व्यवसाय अच्छा चलने लगा| आज पांगरी जैसे छोटे से गांव में वे साल में तीन करोड़ रुपये का कारोबार करते हैं| उन्होंने कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प के ज़ोर पर यह सफलता हासिल की है|

बागवान संपर्कों की बदौलत कृषि औषधियों की बिक्री शुरू की
बाबासाहेब की सफलता की कहानी भी गरीबी से ही शुरू हुई| बार्शी के शिवाजी कॉलेज में उन्होंने अंग्रेज़ी विषय लेकर बी.ए. और फिर बी.पी.एड. पूरा किया| उन्होंने संगमेश्वर तालुका के डिंगणी नामक गांव में केदारेश्वर माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक के रूप में नौकरी भी शुरू की| लेकिन चूँकि स्कूल के पास अनुदान नहीं था, इसलिए बाबासाहेब का वेतन बहुत कम था| उस वेतन में खर्चा पूरा नहीं होता था| अनिच्छा से उन्हें अपनी नौकरी छोड़कर गांव लौटना पड़ा| ये घटना १९९९ के आसपास की है| उन्होंने 'एसटीडी बूथ' का व्यवसाय शुरू करने का फैसला किया| इस बीच, पांगरी में टेलीफोन एक्सचेंज का काम शुरू हो गया था| उन्होंने आवेदन किया और पांच हज़ार रुपये के गारंटी बॉन्ड के साथ उन्हें मंज़ूरी दे दी गई| इस बात की कोई निश्चितता नहीं थी कि पांगरी जैसे छोटे से गांव में 'एसटीडी बूथ' अच्छा व्यवसाय करेगा या नहीं| कई शुभचिंतक नकारात्मक प्रतिक्रिया दे रहे थे| लेकिन पांगरी इलाके में अंगूर के बागों ने उन्हें अच्छी मदद दी|

इन अंगूरों को खरीदने के लिए राज्य के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ विदेशों से भी अंगूर व्यापारी पांगरी में ठहरते थे| उन्हें बाज़ार भाव के लिए लगातार एसटीडी फोन का उपयोग करना पड़ता था| एसटीडी बूथ सुबह सात बजे से रात ग्यारह बजे तक खुला रहता था| इस बूथ की बदौलत कई अंगूर बागवानों और व्यापारियों से उनकी अच्छी पहचान बन गयी और यहां तक कि दोस्ती भी हो गयी| एसटीडी बूथ के माध्यम से कॉन्फ्रेंस सेवाएं प्रदान कर कई लोगों को जोड़ा गया| नगण्य प्रतीत होने वाले व्यवसाय से बाबासाहेब ने २५ प्रतिशत कमीशन और दो रुपये सर्विस चार्ज अर्जित किया| कमाई की शुरुआत अच्छी रही| एसटीडी बाबा की ख्याति हर तरफ फैल रही थी| लेकिन अगले पांच-छह सालों में हर जगह एसटीडी बूथ, कॉइन बॉक्स, मोबाइल सेवाएं शुरू हो गईं| ज़ाहिर है, उनके लिए इस बूथ को बंद करने का समय आ गया| उस समय, उन्होंने स्कूल का सामान बेचने या स्टेशनरी की दुकान शुरू करने के बारे में सोचना शुरू कर दिया, लेकिन इसे लेकर वे बहुत उत्साहित नहीं थे| आख़िरकार, वर्ष २००७ में, उन्होंने किसानों और बागवानों के साथ अपने संपर्क के माध्यम से कृषि औषधियां बेचना शुरू किया| और वे एक अच्छा व्यवसाय खड़ा करने में सफल रहे|

बाबासाहेब कहते हैं, "नौकरी के लिए शिक्षा समाज में पैदा की गई एक मीठी गलतफहमी है| नौकरी न लगने के कारण निराश नहीं होना चाहिए| एक सफल उद्यमी बनने के लिए पूंजी की नहीं बल्कि ईमानदारी और कड़ी मेहनत की आवश्यकता होती है| आपकी परिस्थितियां कभी भी आपके व्यवसाय के आड़े नहीं आ सकतीं| यदि कोई व्यक्ति एक विशिष्ट लक्ष्य को ध्यान में रखकर कड़ी मेहनत करता है तो वह ग्रामीण क्षेत्र में भी एक सफल उद्यमी बन सकता है| मैंने हर कठिनाई को एक चुनौती के रूप में देखकर उस पर विजय प्राप्त की और १६ वर्षों में ओंकार कृषि केंद्र के माध्यम से मैंने एक अच्छा व्यवसाय स्थापित किया है|”

दुकान में छोटी-बड़ी सभी वस्तुएं रखने की कोशिश की ताकि ग्राहक खाली हाथ न लौटे
ओंकार कृषि केंद्र शुरू करने के लिए बाबासाहेब शिंदे को ४० हज़ार रुपये की ज़रूरत थी| उनके पास चिटफंड से २५,००० रुपये और १५,००० रुपये की कुछ व्यक्तिगत बचत थी| शुरुआत में उन्होंने केवल चुनिंदा खाद, कीटनाशक, बीज खरीदकर व्यवसाय शुरू किया| कृषि केंद्र शुरू करते समय कुछ लोगों ने उन्हें हतोत्साहित करने का प्रयास किया| बार्शी में एक साथी व्यवसायी ने उन्हें यह समझाने की भी कोशिश की कि यह व्यवसाय किस प्रकार घाटे का सौदा है| लेकिन फिर भी बिना डगमगाए बाबसाहेब ने ईमानदारी के साथ व्यवसाय स्थापित किया| उन्होंने अपना पूरा समय इसके लिए समर्पित कर दिया| शुरुआत में उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा क्योंकि उन्हें इस व्यवसाय की बारीकियां पूरी तरह से समझ में नहीं आई थीं| बाबासाहेब ने किसानों की मांग के अनुसार खाद, दवाओं और कीटनाशकों की आपूर्ति जारी राखी| बाज़ार में कृषि क्षेत्र से जुड़ी हज़ारों कंपनियां होने के बावजूद उन्होंने अपनी दुकान में केवल नामी कंपनी के खाद, बीज, कीटनाशक रखे| उसने छोटी-बड़ी सभी वस्तुएं अपनी दुकान में रखने की कोशिश की ताकि ग्राहक खाली हाथ न लौटे| उनके पास विभिन्न प्रकार के उत्पाद हैं जैसे कीटनाशक श्रेणी में कराटे, टैफगोर, पॉलीट्रिन सी, कोरंडा, कोराजन, सुपर कॉन्फिडोर, प्रोक्लेम, आदि, बाविस्टीन, एम४५, साफ, कौब्रियोटॉप, आदि कवकनाशी, 19:19:19, 18:46:0, 12:32:16, 24:24 :0, आदि उर्वरक, सोयाबीन, उड़द, मूंग, अरहर, मक्का, मूंगफली, प्याज़ के बीज| उन्हें एहसास हो गया है कि अगर प्रतिस्पर्धा के युग में जीवित रहना है तो उन्हें अलग होना होगा|

वर्तमान में बाबासाहेब का सालाना टर्नओवर तीन करोड़ रुपये है| निकट भविष्य में उनका इरादा एक ऐसा मॉल स्थापित करने का है जिसमें कृषि से संबंधित सभी सामान उपलब्ध हों| बाबासाहेब को लिखने का शौक है और वे 'सकाल' अखबार के सोलापुर संस्करण के पांगरी के संवाददाता हैं| राजनीतिक मामलों पर बारीकी से ध्यान देना, पुराने गाने सुनना उनके शौक हैं| उन्होंने चिंचोली में छत्रपति संभाजी महाराज सार्वजनिक पुस्तकालय शुरू किया| वे १८ वर्षों से पुस्तकालय के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं| उनकी पत्नी अनीता चिंचोली ग्राम पंचायत की निर्विरोध उपसरपंच बनीं| जैसा कि कहा जाता है कि हर सफल आदमी के पीछे एक महिला का हाथ होता है, ऐसे में उनकी पत्नी अनीता का उन्हें पूरा सहयोग मिलता है| उनका बेटा ओंकार इंजीनियरिंग के तीसरे साल में है और बेटी कल्याणी नौवीं में पढ़ रही है| बाबासाहेब ने अपनी प्रतिभा के दम पर अपने व्यवसाय में बड़ी सफलता हासिल की|
बाबासाहेब शिंदे - मोबाइल : 9421032694

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रजनीश जोशी
joshirajanish@gmail.com